Squatting deep hurts knees?

Squat is powerful and functional movement. It is used in almost every resistance training program. Relatively every athlete and fitness enthusiast uses squats to gain strength and power. However, there is lot of controversy regarding saftey. The most common concern is how deep you should go with squat. Some experts claim squatting as deep as possible ( ass to grass) is the only way of squatting, meanwhile others believe deep squats are harmful for knees and one should refrain from doing so. So, let’s discuss it in details.

Lets, start with how this controversy took shape. In late 50’s Dr. Karl Klein concerned about college football players sustaining serious knee injuries. He suspected that the use of full range of motion deep squats during team weight training was the reason behind knee injuries. In 1961, Dr. Karl Klein released his research. He claimed that the athletes who performed deep squats were potentially compromising the stability of their knees, because squatting deep stretched out the ligaments of knee. He recommended that all squats should be performed only to parallel depth. Soon after the fear of deep squatting spread everywhere. American Medical Association (AMA) came with statement cautioning against the use of deep squats. Even New York school issued a statement banning gym teachers from using the full depth squat in physical education classes.

In 1964, Dr. John Pulskamp wrote “full squats are not bad for knees and they should certainly not be omitted out of fear of knee injury”. Despite Dr. John Pulskamp’s efforts, the damage that Dr. Karl Klein theory had inflicted been done. By the end of decade, Strength coaches across America stopped teaching the full depth squats.

However, over the past 25+ years, we have learned a lot more about knee health and squats. Thanks to the advancement in exercise science and biomechanics research. Now lets go over what we have learned in past few decades to better understand the knee joint during deep squat.

The concern over deep squats related to the amount of stress placed on the anterior cruciate ligament (ACL) and posterior cruciate ligament (PCL) with an increased flexion angle of the knee. Over the years, more studies have conducted that deep squatting actually results in less shear movement and rotational movement between femur (bone of thigh) and tibia (bone of leg) which intur implies their is less stress on ACL and PCL than previously thought.

Current evidence shows that deep squat results in greater activation of the glutes, hamstring and quadriceps as compared to partial squats. Higher activation of lower body musculature in deep squats allows to increase lower body strength as well as also improve their ability to stabilize knee joint. Larger glute activation and concurrent activation of the hamstring and quadriceps results in a decrease in the shear force applied to the ACL and PCL. Research even shows that the stress to ACL during a squat is actually highest during the first 4 inches of the squat descent. As depth increases the force placed on ACL significantly decreases. The highest forces ever measured on ACL during a squat has been found to be around 25% of its ultimate strength.

Every coach must consider few things when determining optimal squat depth. Everyone should have the capacity to perform a bodyweight deep squat. Squat depth should be limited to perform with good technique. Poor movement only increases our risk for injury. Squatting to full depth poorly is a great way to invite injury. If heavy loads are not used excessively, squatting to full depth are good option for knee health. Now you have better understanding of full depth squats, feel free to get that ass to grass.

Cardio for fat loss?

If you want to lose fat quickly, increased cardio might not be the right solution. We lose fat by exercising regularly since muscles require energy and more energy we utilise, it becomes easier to achieve calorie deficit and in turn realize our fat loss goal.

What most people think about exercising for fat loss?

It does not matter if it is cardio, sports or weight lifting, your goal should be to activate as much muscles as possible.

But, here is the thing, our body adapts and we do not activate as much muscle or burn calories for the same repeated tasks over time.

For reference , running 2 miles daily feels easier after few days. It implies, you literally are not activating as much muscles or burn calories as needed. That’s why people have to spend longer amount of time to run greater distances to continue losing fat. But in today’s busy world how many of us can afford more time? So, more cardio might not be the long term answer for many of us.

So, what is required to be done to maximise fat loss in short span of time?

With resistance training and periodization, we can introduce different types of stress where in body and muscles do not adapt easily, and you can continue to activate more muscles as well as burn more calories within the same amount of time.

I specifically believe in the fact that losing fat is the healthy solution instead of emphasizing on losing weight. It is possible to lose inches without actually seeing any significant change in your body weight. By resistance training and periodization, you are continuously activating more muscles as well as likely to maintain your muscle mass with appropriate nutritional intake and have most of your weight loss in form of fat instead of muscle mass which is necessary to allow you to eat more as you lose fat.

भारत में क्रिकेट का इतिहास

भारत में अंग्रेजो के आगमन और सन 1600 ई० में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के बाद भारत और इंग्लैंड के बीच ब्यापार का मार्ग प्रशस्त हो गया 18 सदी के मध्य कुछ समुद्री नाविकों के द्वारा इंग्लैंड से भारत में क्रिकेट आया। धीरे धीरे ये खेल भारत में जड़े जमानी शुरू कर दी 1928 में भारत में बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) की स्थापना हुई और ठीक इसके 4साल बाद भारत ने अपना पहला टेस्ट 25 जून 1932 को लॉर्ड्स में कर्नल सीके नायडू के नेतृत्व में खेला। अगले वर्ष 1933-34 के सत्र में इंग्लिश टीम भारत आई और इसी सिरीज़ के दौरान लाला अमरनाथ ने भारत के लिए पहला टेस्ट शतक लगाया।

भारत अपने टेस्ट की शुरुआत के बीस साल बाद 1951–52 के सत्र में पहली टेस्ट जीत इंग्लैंड के खिलाफ की। और अगली ही सीरीज जो पाकिस्तान के खिलाफ घरेलु सिरीज़ खेली गई पाकिस्तान को 2–1 से हराकर पहली टेस्ट सीरीज जीत का स्वाद चखा। 1968 में न्यूजीलैंड दौरे पर गई भारतीय टीम ने न्यूज़ीलैंड को 3–1 से हराकर विदेश में पहली टेस्ट सीरीज जीती। उसके बाद 1971 में वेस्ट इंडीज को बेस्ट इंडीज में 1-0 से तथा इंग्लैंड को इंग्लैंड में 1–0 से हराकर समूची दुनिया को हत प्रभ कर दिया। 13 जुलाई 1974 को भारत ने अपना पहला एकदिनी मुकाबला इंग्लैंड से ओवल में खेला परिणाम इंग्लैंड के पक्ष में रहा। 1975 में पहले विश्व कप में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा और पूरी प्रतियोगिता के दौरान एक मात्र मैच नवोदित ईस्ट अफ्रीका से जीता।

1979 के दूसरे वर्ल्ड कप के दौरान भारत का प्रदर्शन बेहद ही निराशाजनक रहा और प्रतियोगिता में एक भी मैच नहीं जीत पाई 1983 के वर्ल्ड कप में कपिल देव के नेतृत्व में भारतीय टीम का प्रदशन बहुत ही शानदार रहा फाइनल सहित प्रतियोगिता में 6 मैच जीते। फाइनल में भारत के बनाये गए 183 रन को बेस्ट इंडीज की मजबूत बैटिंग आर्डर लक्ष्य से 43 रन दूर रह गई क्लाइव लियाद,रिचर्ड्स,ग्रीनिज,हेन्स, जैसे खिलाडी भारतीय गेंद बाजो की नहीं झेल पाये और 140 रन पर ही ढेर हो गए। इसी विश्व कप जीत से भारत में क्रिकेट तेजी से लोकप्रियता की और बढ़ा और 1987 के विश्व कप की मेजबानी भारत और पाकिस्तान को संयुक्त रूप से मिला। भारत ने 8 साल बाद 1996 में फिर विश्व कप की मेजबानी की और विल्स वर्ल्ड कप काफी सफल रहा। 1998 में ऑस्ट्रेलिया को घरेलु सीरीज में 2-1से हराकर टेस्ट क्रिकेट की मजबूत टीम की तरफ बढ़नी शुरू कर दी। इस दौरानभारत में तेंदुलकर ,द्रविड़,गांगुली की त्रिमूर्ति विपक्षी गेंदबाजो में खौफ पैदा कर दी 2001 की घरेलु सीरीज में ऐसी ऑस्ट्रेलिया जो 17 लगातार मैच जीती थी उसे 2-1से हराकर स्तब्ध कर दिया और कोलकाता टेस्ट में लक्ष्मण के 281 और द्रविण के 180 रन ने फॉलो ऑन होने के बाद भारत को जीत दिला दी 2007 में महेंद्र सिंह धोनी की नेतृत्व में युवा भारतीय टीम ने पाकिस्तान को फाइनल में 5 रन से हराकर पहला टी20 वर्ल्ड कप जीतकर दुनिया में तहलका मचा दिया। 2011 का विश्व कप जो भारत श्रीलंका व बांग्लादेश की मेजबानी में खेला गया 2 अप्रैल 2011 को मुंबई के बानखेड़े स्टेडियम में खेला गया फाइनल मैच में भारत ने श्रीलंका को 6 विकेट से हराकर अपनी ही धरती पर विश्व कप जीतने वाली पहली टीम बनी 2018-19 में भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया को 2–1 से हराकर ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज जीतने वाली एशिया की पहली टीम बनी। क्रिकेट में भारत की मजबूती इसी से लगाया जा सकता है कि दिसंबर 2009 से 2011 तक टेस्ट में दुनिया की नंबर एक टीम और 2017–18 से अब तक दुनिया की नंबर 1 टीम बनी है इस दौरान कई बार एक दिनी मैचों की भी आईसीसी रैंकिंग में नंबर 1 पर रही।

कपिल देव के 329 रन बनाने के बाद आ गया था टीम इंडिया से बुलावा

अलीगढ़ में क्रिकेट की बात हो और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की उपलब्धियों का ज़िक्र न हो। ऐसा हो नहीं सकता। देश की आज़ादी से पहले इस यूनिवर्सिटी के विलिंग्डन पवेलियन क्रिकेट मैदान पर अंग्रेज क्रिकेट खेला करते थे और आज़ादी के बाद से भारतीय क्रिकेट खेल रहे हैं। ऐसे में इस मैदान का नाता क्रिकेट से एक सदी से भी ज़्यादा पुराना है।

एएमयू से होकर जाता था टीम इंडिया का रास्ता

एक वक़्त था जब पवेलियन से होकर टीम इंडिया का रास्ता जाता था। इस यूनिवर्सिटी ने उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश को नायाब क्रिकेटर दिए हैं, जिनके नाम आज भी क्रिकेट जगत में बड़े ही अदब से लिए जाते हैं। इन्हें क्रिकेट जगत में जेंटलमैन के नाम से जाना जाता है। इन महान क्रिकेटरों की भले ही अलीगढ़ जन्म भूमि न रही हो, लेकिन इस भूमि को उन्होंने जन्म भूमि से कम भी नहीं माना। आप सोच रहे होंगे कि आख़िर यह कौन-सा क्रिकेटर है, जिसके बारे में इतने कसीदे पढ़े जा रहे हैं, तो जान भी लीजिए इन क्रिकेटरों को। इनमें सीएस नायडू, लाला अमरनाथ, सैयद मुश्ताक़ अली, वाज़िर अली, नाज़िर अली, जहांगीर ख़ान जैसे दिग्गज क्रिकेटर हैं, जिन्होंने देश के लिए ऐतिहासिक कई टेस्ट मैच खेला और अपनी उपयोगिता भी साबित की। सैयद मुश्ताक़ अली टॉफी इसकी बानगीभर है। एएमयू के क्रिकेटर रणजी व ज़ोनल टूर्नामेंट के हिस्सा रहे। इनमें असलम अली, बायर एम ख़ान, फरहत अली, ग़ौरी मजीद, मोहम्मद शाहिद, रफी उल्ला ख़ान, रिज़वान शेख, हसीन अहमद, रिज़वान शमशाद, ज़हीरउद्दीन बॉबी, ज़मीरउद्दीन अहमद, मोहसिन बिलाल, मोहम्मद इमरान अली, इम्तियाज़ अहमद सहित अन्य क्रिकेटरों के नाम एएमयू गेम्स कमेटी के पन्नों में दर्ज है। एएमयू के कप्तान रहे इम्तियाज़ अहमद आईपीएल में पुणे वारियर्स टीम का हिस्सा बन चुके हैं।

कपिल देव ने एएमयू में खेली थी मैराथन पारी

एएमयू के विलिंग्डन पवेलियन क्रिकेट मैदान पर वर्ष 1977 में कपिल देव की खेली गई मैराथन 329 रन की पारी आज भी लोगों को याद है। वह इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट प्रतियोगिता खेलने आए थे। इसके बाद उन्हें फौरन इंडिया टीम से बुलावा आ गया। टीम के साथ पाकिस्तान का दौरा किया।

वीरेंद्र सहवाग, आशीष नेहरा, मनोज प्रभाकर दिखा चुके हैं जौहर

एएमयू के मैदान पर अरुण लाल, सुरेंद्र अमरनाथ, शिवलाल यादव, अशोक गंडोत्रा, वेंकट सुंदरम, रंधीर सिंह, चेतन शर्मा मनोज प्रभाकर, वीरेंद्र सहवाग, आकाश चोपड़ा, आशीष नेहरा, सहित कई क्रिकेटर खेलने आए, जो बाद में टीम इंडिया से खेले।

विराट कोहली के कोच राजकुमार शर्मा

इसी मैदान पर विराट कोहली के कोच राजकुमार शर्मा, केके शर्मा भी अपने खेल का लोहा मनवा चुके हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी एएमयू क्रिकेट टीम के विकेटकीपर रह चुके हैं। अंग्रेज अफसर, नवाब, राजाओं के राजकुमार के क्रिकेट खेलने की यादों को पवेलियन क्रिकेट मैदान अपने अंदर संजोए हुए है। बशर्ते, उसे एहसास करने की ज़रूरत है। आज भी बरसों पुरानी मीठी-मीठी यादों की झलक पवेलियन की दीवारों पर दिखती है।

भारत में हॉकी का इतिहास

फुटबाल ,क्रिकेट की तरह हॉकी भी दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल है। साथ ही ये दुनिया के सबसे पुराने खेलो में से एक है,हॉकी ओलिंपिक गेम्स से भी पुराना है। अरब, यूनान, रोम, पर्शिया (आज का ईरान), इथियोपिया तक हॉकी खेला गया है। लेकिन बहुत कम ऐसे देश रहे है जहाँ पर हॉकी को उचित स्थान मिला हो। वहीँ कई ऐसे लोग रहे है जो हॉकी को केवल मनोरंजन की द्रिष्टि से खेलते रहे है।

भारत में हॉकी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन
दरअसल भारत में हॉकी को ब्रिटिश सेना के रेजीमेंट्स द्वारा पेश किया गया था,इसके बाद इस खेल की लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ती चली गई तथा इस खेल में भारत ने दिनों दिन अपनी अलग पहचान बना ली। हम आप को बतादे की पहली बार 29 अक्टूबर 1908 को लंदन ओलिंपिक खेल में हॉकी को हिस्सा मिला उस समय कुल 6 देशों की टीमो ने प्रतिभाग किया। 1924 में अंतर्राट्रीय हॉकी फेडरेशन (आईएचएफ ) का गठन हुआ तथा इसके ठीक 3 साल बाद अंतर्राष्ट्रीय फेडरेशन ऑफ वूमेन का गठन हुआ। हॉकी का खेल एशिया में सर्बप्रथम खेला गया, भारत में लगातार हॉकी का विकास होता गया और 1928 में एम्स्टर्डम ओलिंपिक में हॉकी का स्वर्ण जीता साल 1928 से 1956 का दौर भारतीय हॉकी का स्वर्णिम दौर रहा और लगातार 6 स्वर्ण ओलिंपिक में जीते, ध्यान रहे 1960 में रजत और 1964 और 1980 में फिर स्वर्ण पदक जीते। एशियाड के शुरूआती 2 चरणों में हॉकी को जगह नहीं मिली लेकिन जैसे ही एशियाई खेलों में जगह मिली वैसे वैसे भारतीय हॉकी का प्रभुत्व एशिया में भो कायम होता गया। हॉकी का खेल 2 टीमो के मध्य खेला जाता है जिसमे प्रत्येक टीम में 11–11खिलाडी होते है हर टीम का लक्ष्य गोल करने की होती है। मैदान की आकार की बात करे तो इसकी लंबाई 92 मीटर और चौड़ाई 52 से 56 मीटर होती है वही हॉकी के खेल में स्टिक, गेंद, चूस ड्रेस, कैनवास के जूते, जालिया आदि सामान प्रयोग में आते है।

ओलिंपिक और भारतीय हॉकी का प्रदर्शन
भारतीय हॉकी टीम ने अपने सफल शुरुआत की और 1928 के एम्स्टर्डम ओलिंपिक में स्वर्ण जीता उसके बाद 1932में लॉस एंजिल्स ,1936 वर्लिन, 1948 लन्दन 1952 हेलसिंकी 1956 में मेलबोर्न एवं 1964 में टोक्यो,1980 के मास्को ओलिंपिक में स्वर्ण जीते। इसके साथ ही 2 कांस्य और 1 रजत भी जीते इस दौरान दिग्गज खिलाड़ियो में हॉकी के जादूगर ध्यान चंद, ज़फर इकबाल, बलबीर,सिंह, अशोक कुमार, मोहम्मद शाहिद, परगट सिंह, मुकेश कुमार जैसे खिलाड़ियो ने अपने खेल से गौरवान्वित किया। 1971 में शुरू हॉकी के विश्व कप प्रतियोगिता में भी शुरूआती चरणों में भारतीय टीम का खेल काफी सराहनीय रहा, पहले विश्व कप में कांस्य 1973 के दूसरे विश्व कप में रजत 1975 के तीसरे विश्व में स्वर्ण के साथ विश्व कप विजेता बनी इसके अलावा भारतीय हॉकी टीम ने 1968 में बैंकाक 1998 में धनराज पिल्लै के अगुवाई में बैंकाक और 2014 के एशियाड में भी हॉकी का स्वर्ण जीता।

भारतीय हॉकी टीम 1948 लन्दन ओलिंपिक

मेजर ध्यान चन्द, हॉकी के जादूगर

सुनील गावस्कर के अंतिम टेस्ट मैच की कहानी

सुनील गावस्कर टेस्ट क्रिकेट के सबसे शानदार बल्लेबाजों में से एक. लिटिल मास्टर के नाम से मशहूर गावस्कर की बैटिंग के फैंस पूरी दुनिया में हैं. एक वक्त था जब टेस्ट क्रिकेट के तमाम टॉप रिकॉर्ड इन्हीं के नाम थे. 1987 में पाकिस्तान के खिलाफ पांच मैचों की टेस्ट सीरीज के बाद गावस्कर रिटायर हो गए. यह सीरीज बल्ले से उनके लिए इतनी खास नहीं रही थी. गावस्कर ने उस सीरीज के पांच में से चार मैच खेले थे. इन मैचों की छह पारियों में वह 295 रन ही बना पाए. सीरीज में सबसे ज्यादा रन बनाने वालों की लिस्ट में वह सातवें नंबर पर थे.

पांच मैचों की सीरीज के पहले चार मैच ड्रॉ रहे थे. आखिरी मैच बेंगलुरु में खेला जाना था. गावस्कर पहले ही बता चुके थे कि इस सीरीज के बाद वह नहीं खेलेंगे. यह मैच उनके बेहतरीन टेस्ट करियर का आखिरी टेस्ट था. सामने वो टीम थी जिसने कभी भारत को उसी के घर में टेस्ट सीरीज में नहीं हराया था. दोनों टीमों की कमान उस वक्त के दिग्गज ऑलराउंडर्स, इमरान खान और कपिल देव के हाथों में थी. भारतीय फैंस ने सोचा था कि टेस्ट क्रिकेट के महानतम ओपनर को भव्य विदाई दी जाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 17 मार्च 1987 को खत्म हुए इस टेस्ट में खूब ड्रामा हुआ था.

पाकिस्तानी कप्तान इमरान इस सीरीज में ऐसी टीम के साथ आए थे जिसका प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं था. इसके साथ ही टीम के अंदर की बातें भी बाहर आने लगी थीं. ऐसा करने वाला भी कोई बाहर का नहीं था. टीम के मिडल ऑर्डर बैट्समैन क़ासिम उमर ने ड्रेसिंग रूम के शर्मिंदा करने वाले सीक्रेट्स खोलने शुरू कर दिए थे. उन्होंने इमरान को खुदपसंद और प्रदर्शित पक्षपात करने वाला करार दे दिया. बाद में वह इससे भी आगे निकल गए. इंडिया टूर में ना चुने जाने के बाद उन्होंने कहा कि इमरान समेत ज्यादातर प्लेयर्स ड्रग एडिक्ट हैं. अपने होटल रूम में अक्सर लड़कियां लाते हैं और शराब में डूबे रहते हैं.

ऐसे माहौल में पाकिस्तानी टीम भारत आई थी. सीरीज के पहले चार मैचों में कुछ भी पॉजिटिव नहीं दिखा. चौथे मैच तक आते-आते तो दर्शक भी बेकाबू हो गए. डेड विकेट पर दोनों टीमों का डिफेंसिव गेम देख लोग ऊब चुके थे. अहमदाबाद में हुए चौथे टेस्ट में क्राउड ने जमकर बवाल काटा. बाउंड्री पर खड़े पाकिस्तानी प्लेयर्स पर पत्थर और सड़े हुए फल फेंके गए. गुस्साए इमरान खान ने दो बार अपने प्लेयर्स के साथ मैदान छोड़ दिया.

इमरान का आरोप था कि भारत ने जानबूझकर घटिया विकेट बनाए और नेगेटिव क्रिकेट खेल रहे हैं. जबकि कपिल का मानना था कि पाकिस्तानी बहुत डिफेंसिव हो रहे हैं. तमाम आलोचनाओं के बाद BCCI ने आखिरी टेस्ट के लिए स्पोर्टिंग ट्रैक बनाने का फैसला किया. मैच से पहले पिच देखने के बाद इमरान ने अपनी टीम में तीन तेज गेंदबाज (वसीम अकरम, सलीम जाफर और इमरान खुद) चुने. इनके साथ उन्होंने ऑलराउंडर मंज़ूर इलाही को भी टीम में रखा. मंज़ूर मीडियम फास्ट बोलिंग भी करते थे. ऑफ स्पिनर तौसीफ अहमद और इक़बाल क़ासिम को भी टीम में जगह मिली.

इमरान ने टॉस जीता और पहले बैटिंग का फैसला किया. पिच पहली बॉल से टर्न हो रही थी. मनिंदर सिंह, रवि शास्त्री और शिवलाल यादव की तिकड़ी ने पाकिस्तान को खूब परेशान किया. इनकी स्पिन के आगे पाकिस्तान सिर्फ 116 पर सिमट गई. सलीम मलिक ने सबसे ज्यादा 33 रन बनाए. भारत के लिए मनिंदर ने सात विकेट लिए. उस मैच को देखने वाले बताते हैं कि उस दिन मनिंदर को खेलना लगभग नामुमकिन था. उनकी हर बॉल विकेट लेती हुई दिख रही थी. पहले दिन भारत ने भी बैटिंग की और दो विकेट खोकर 68 रन बनाए. दोनों ओपनर्स गावस्कर और श्रीकांत 21-21 रन बनाकर आउट हो चुके थे. दोनों विकेट तौसीफ के खाते में गए थे.

पहले दिन का खेल खत्म होने के बाद पाकिस्तानी टीम ने मीटिंग की. बहुत देर तक सोच-विचार हुआ कि क्यों पाकिस्तानी बोलर्स मनिंदर जैसी कामयाबी नहीं हासिल कर पा रहे. इसके बाद टीम के वाइस कैप्टन जावेद मियांदाद ने पूर्व भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी को फोन किया. दोनों की अच्छी दोस्ती थी और जावेद ने अपने दोस्त से मदद मांगी.

फोन पर बात कर जावेद ने अपने दोनों स्पिनर्स तौसीफ और क़ासिम को बेदी के होटल भेजा. वहां बेदी ने उनसे कहा कि मनिंदर ठीक वैसी बोलिंग कर रहे हैं जैसी वह खुद करते. खुद की जगह विकेट से ज्यादा काम लेते. बेदी ने कहा,
तुम लोग बॉल को स्पिन कराने की बहुत ज्यादा कोशिश कर रहे हो. बॉल को बहुत ज्यादा घुमा रहे हो. नॉर्मल बॉल करो और पिच को खुद से स्पिन कराने दो.

बेदी की टिप काम आई और दोनों ने पांच-पांच विकेट लेते हुए भारत को 145 पर समेट दिया. यह पाकिस्तानी मीटिंग में तय किए गए लक्ष्य से भी पांच रन कम थे. दूसरी पारी में जावेद ने रमीज़ रज़ा के साथ खुद पारी की शुरुआत का फैसला किया. कप्तान इमरान ने अपने डिप्टी का सपोर्ट किया और उनकी बात मान ली. उन्होंने कपिल की सोच के उलट शुरुआत से ही अटैकिंग बैटिंग करने का फैसला किया. दोनों ने मिलकर पहले विकेट के लिए 45 रन जोड़े. इसी स्कोर पर शास्त्री ने जावेद को आउट कर दिया.

89 पर तीन विकेट खोने के बाद जावेद और इमरान ने एक और प्रयोग किया. उन्होंने मनिंदर की बोलिंग को बेअसर करने के लिए इक़बाल क़ासिम को बैटिंग में प्रमोट किया. यह दांव चला भी. हर पल टूटते विकेट पर इक़बाल ने सलीम मलिक के साथ बहुमूल्य 32 रन जोड़े. 121 के टोटल पर मलिक को कपिल देव ने बोल्ड किया. इसके बाद इक़बाल ने इमरान खान के साथ 21 रन जोड़े. अंत में वह 33 रन बनाकर शिवलाल यादव की बॉल पर आउट हुए. विकेटकीपर सलीम यूसुफ ने 41 रन की जरूरी पारी खेली. पाकिस्तान अंत में 249 बनाकर ऑलआउट हुआ. भारत को ढाई दिन में 220 रन बनाने का लक्ष्य मिला.

वसीम अकरम के आगे टीम इंडिया ने जल्दी-जल्दी विकेट गंवाए. दिन का खेल खत्म होने तक टीम 99 पर चार विकेट खो चुकी थी. ओपनर सुनील गावस्कर का साथ दे रहे थे मोहम्मद अज़हरुद्दीन. मैच चौथे (टेक्निकली पांचवें, क्योंकि टेस्ट का चौथा दिन रेस्ट डे होता था) दिन पर खत्म होना लगभग पक्का था. दोनों ही टीमें मैच और सीरीज जीतने की हालत में थीं. गावस्कर गज़ब के टच में थे और उनका साथ दे रहे थे बेहतरीन टैलेंटेड अज़हर. चौथे दिन जब दोनों क्रीज पर आए तो भारत को सिर्फ 119 रन की जरूरत थी.

दोनों ने संभलकर खेलना शुरू किया. लेकिन टोटल 123 पर पहुंचा ही था कि कांड हो गया. अज़हर ने तौसीफ की एक शार्प ऑफ-ब्रेक को बैकफुट पर खेलने की कोशिश की लेकिन चूक गए. अज़हर को बोल्ड कर तौसीफ ने मैच पाकिस्तान की ओर झुका दिया. गावस्कर एक एंड पर खड़े रहे लेकिन काम बना नहीं. पाकिस्तान की मानें तो इस मैच में अंपायरों ने बेईमानी भी की थी. इस पारी में कई बार पाकिस्तानी प्लेयर्स अंपायरों से भिड़े थे. एक LBW और फिर क्लोज कैच पर जब गावस्कर आउट नहीं दिए गए तो पाकिस्तानी प्लेयर्स ने अंपायर को घेर लिया और साफ बोल दिया की बेईमानी हो रही है.

गावस्कर बॉल को लेट खेलकर सिंगल और डबल्स में रन बना रहे थे. शास्त्री के साथ मिलकर उन्होंने पारी 155 तक पहुंचाई. इसी स्कोर पर शास्त्री ने क़ासिम की बॉल पर उन्हीं को कैच थमा दिया. इसके बाद बैटिंग करने आए कपिल देव. अभी स्कोर में छह रन ही जुड़े थे कि क़ासिम ने कपिल को बोल्ड कर दिया. 50 हजार से ज्यादा लोगों से भरे स्टेडियम को मानों काटो तो खून नहीं. एकदम खामोश.

गावस्कर अब भी जीत और पाकिस्तान के बीच चट्टान की तरह खड़े थे. राजा लियोनाइडस की तरह. अटूट, हार निश्चित होने के बाद भी अंत तक लड़ने को तैयार. अब उनका साथ देने आए रोजर बिन्नी. गावस्कर ना सिर्फ एक छोर थामकर खड़े थे बल्कि इसके साथ रन भी बनाने का जिम्मा उनका ही था. लेकिन लियोनाइडस की तरह गावस्कर भी मैच फिनिश नहीं कर पाए. 180 के टोटल पर उन्होंने क़ासिम की एक बॉल को डिफेंड करने की कोशिश की. बॉल टूटे विकेट पर पड़कर उछल गई, बल्ले का ऊपरी किनारा लिया और पहली स्लिप में रिज़वान उज़ ज़मान ने तेजी से आए इस ऊंचे कैच को पकड़ लिया. इसके साथ ही गावस्कर को पैवेलियन लौटना पड़ा. आखिरी बार.

185 के टोटल पर भारत का नौवां विकेट गिरा. रोजर बिन्नी का साथ देने आए मनिंदर सिंह. पाकिस्तान जीत के बेहद करीब था. यहां से बिन्नी ने अटैक करने का फैसला किया. उन्होंने तौसीफ की एक बॉल को मैदान के सबसे लंबे हिस्से की बाउंड्री के बाहर फैंस तक पहुंचा दिया. भारत को जीत के लिए सिर्फ 17 रन चाहिए थे. बिन्नी का मूड देखते हुए यह कुछ गेंदों का मैच लग रहा था. तभी तौसीफ ने एक गेंद थोड़ी तेज फेंकी. बॉल शॉर्ट थी और ज्यादा टर्न भी नहीं हुई. बिन्नी की आंखें शिकार देखते भूखे शेर की तरह चमकी. बैकफुट पर जाकर उन्होंने बल्ले को पूरी ताकत से घुमा दिया.बॉल बैट पर पूरी तरह से आई नहीं. बॉल ने घूमते बल्ले का बाहरी किनारा लिया और विकेटकीपर सलीम यूसुफ के ग्लव्स में समा गई. पाकिस्तानियों ने जोरदार अपील की. अंपायर एकदम शांत खड़ा रहा, किसी नेशनल इशू पर रिएक्ट करते मोदीजी की तरह. पूरा स्टेडियम शांत. ऐसा शांत जैसे बोधिवृक्ष के नीचे बैठे गौतम बुद्ध. ये सब लगभग पांच सेकेंड तक चला. सुनने में यह वक्त बेहद कम लगता है लेकिन ऐसे माहौल में पांच सेकेंड कई सदियों जैसे हो जाते हैं. पाकिस्तानी प्लेयर्स को ऐसा ही लगा और उन्होंने अंपायर की ओर दौड़ लगा दी. प्लेयर्स को अपनी ओर आता देख अंपायर ने धीरे से अपनी उंगली उठा दी. बिन्नी आउट हो चुके थे. भारत 16 रन से हार चुका था.

पाकिस्तान ने भारत की धरती पर अपनी पहली टेस्ट सीरीज जीत ली. सुनील गावस्कर का टेस्ट करियर खत्म हो चुका था. 125 मैच, 10122 टेस्ट रन, 34 टेस्ट शतक. गावस्कर यह सब हासिल करने वाले पहले इंसान के रूप में रिकॉर्डबुक में अमर हो चुके थे.

गावस्कर की यह पारी उनकी बेस्ट इनिंग्स में शामिल की जाती है. लेकिन कई बार आपका बेस्ट भी आपको जीत नहीं दिला पाता.

भारत में खेलो का इतिहास

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी खेल प्राचीन काल से ही खेले जाते रहे है प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक परिवर्तन की विभिन अवस्थाओं से गुजरे है। कबड्डी,खो-खो,गिल्ली डंडा,शतरंज ,कुश्ती,तीरंदाजी आदि परंपरागत खेलो के अलावा विभिन्न देशों में संपर्क में आने के बाद भारत में क्रिकेट,जुडो,हॉकी,टेनिस,बैडमिंटन,आदि खेलो का प्रचलन भी बहुत तेजी से हुआ है। भारत के अलग अलग हिस्सो में भी अलग अलग किस्म के खेल जैसे बाग़ बकरी,तिरेल,आइस पास,गेंद तारी,चिर्री पाती,हाथी -छू, आदि खेले जाते रहे है।

प्राचीन कालीन खेल
साहित्यिक श्रोत रामायण और महाभारत से भी ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में द्यूत क्रीड़ा,निशाने बाजी,घुड़सवारी,रथ दौड़ ,चौपड़ आदि खेल खेले जाते रहे है। ऐसे बहुत सारे खेल है जिसका जन्म दाता भारत रहा है। ईसा के 2500 से 1500 वर्ष पूर्व सैन्धव सभ्यता काल में भी कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और खेलो के उपकरण प्रयोग किये जाते थे।

आधुनिक कालीन खेल
भारत में यूरोपियन देश खासकर अंग्रेजो के आगमन के बाद आधुनिक कालीन खेल खासकर क्रिकेट ,हॉकी ,फुटबाल जैसे खेल भी भारत में अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। धीरे धीरे भारत विदेशी खेलो उत्कृष्ट खेल दिखाकर दुनिया को अचंभित भी किया। जैसे हॉकी में 1928 से 1960 तक लगातार ओलिंपिक में स्वर्ण जीतकर भारतीय हॉकी का लोहा मनवाया(1940 व 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के कारण ओलिंपिक के खेल नहीं हुए नहीं तो हॉकी में स्वर्ण पदक की संख्या और बढ़ सकती है उसी तरह 1932 से क्रिकेट टेस्ट का दर्जा प्राप्त करने में बाद 60 और 70 के दशक में क्रिकेट में तेजी से सुधार हुआ और 1968 में न्यूजीलैंड 1971 में वेस्टइंडीज और इंग्लैंड में टेस्ट सिरीज़ जीतकर भारतीय क्रिकेट टीम का लोहा मनवाया उसके बाद 1983 में इंग्लैंड में आयोजित तृतीय विश्व कप को जीतकर दुनिया में क्रिकेट पर दबदबा बनाना शुरू किया 1985 में ऑस्ट्रेलिया में आयोजित विश्व चैंपियन शिप 2007 में आईसीसी T20 का वर्ल्ड कप, 2011 में एकदिनी मुकाबले का विश्व कप जीतकर भारतीय टीम ने क्रिकेट में परचम लहराया और दुनिया की ताकतवर टीमो में शुमार हो गयी।

इसी तरह टेनिस में लिएंडर पेस ने 1996 में एटलांटा ओलंपिक में कांस्य पदक जीत कर टेनिस में भी भारत का नाम रोशन किया। उसके बाद ओलंपिक में भारोत्तोलन में कर्णम मालेश्वरी ने भारोत्तोलन निशाने बाजी में जसपाल राणा कुश्ती में सुशील कुमार ने भी अच्छे प्रदर्शन कर भारत देश को गौरवान्वित किया।

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